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(क़तील शिफाई पाकिस्तान के रहने वाले उर्दू के मशहूर शायर हैं.)

ये मोजेज़ा भी मुहब्बत कभी दिखाए मुझे.
कि संग तुझ पे गिरे और चोट आये मुझे.

मैं अपने पांव तले रौंदता हूं साये को 
बदन मेरा ही सही दोपहर न पाए मुझे.

ब-रंगे-ऊद मिलेगी उसे मेरी खुशबू
वो जब भी चाहे बड़े शौक़ से जलाये मुझे.

मैं घर से तेरी तमन्ना पहन के जब निकलूं
बरहना शह्र में कोई नज़र न आये मुझे.

वही तो सबसे ज्यादा है नुक्ताचीं मेरा
जो मुस्कुरा के हमेशा गले लगाये मुझे.

मैं अपने दिल से निकलूं खयाल किस-किसका
जो तू नहीं तो कोई और याद आये मुझे.

जमाना दर्द के सहरा तक आज ले आया
गुजर कर तेरी जुल्फों के साये-साये मुझे.

वो मेरा दोस्त है सारे जहां को है मालूम
दगा करे वो किसी से तो शर्म आये मुझे.

वो मेहरबां है तो इक़रार क्यों नहीं करता 
वो बदगुमां है तो सौ बार आजमाए मुझे.

मैं अपनी ज़ात में नीलाम हो रहा हूं 'क़तील'
गमे-हयात से कह दो खरीद लाये मुझे.

-----क़तील शिफाई 

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ग़ज़ल

ऐसा वैसा कैसा है.
मैंने उसको देखा है.

घर वाले सब झूठे हैं
सच्चा घर में तोता है.

पकी फसल है चारो ओर
और बिजूका भूखा है.

छत कहती है सुनते हो
पानी ताप-ताप गिरता है.

---मुहम्मद अलवी   

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बहुरूपिया: मैं लिखना चाहता हूँ एक कविता ............


मैं लिखना चाहता हूँ एक कविता   
ताजा -तरीन ,सर्वथा नवीन
जो,गांडीव की टंकार-ध्वनि की सवारी कसे
और संपूर्ण मिथ्यांचल पर मारण-मंत्र की तरह          
 मंडराती रहे .
.
आगे पढने के लिए क्लिक करें.....
बहुरूपिया: मैं लिखना चाहता हूँ एक कविता ............

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ग़ज़ल

(मुहम्मद अलवी अहमदाबाद के रहनेवाले हैं. उनकी शायरी सरल भाषा में दृश्य काव्य का अद्भुत नमूना है . अपनी विशिष्ठ शैली में कुदरत से गुफ्तगू करती अपनी शायरी के कारण वे जदीद दौर के बड़े और अहम् शायरों में गिने  जाते हैं.)  

अजब नहीं कि फिर एक बार मैं बदल जाऊं.
ज़मीं से दूर कहीं और  ही निकल जाऊं.

पुराने वक़्त का सिक्का हूं मुझको फेंक न दे 
बुरे दिनों में ये मुमकिन है मैं भी चल जाऊं.

मुझे नहीं तो किसी और को तो काटेगा
ये सांप है तो इसे मार कर निकल जाऊं.

न काम आएगा ये गोश्त का बदन अलवी 
मशीनी दौर है लोहे में क्यों न dhal जाऊं.

----मुहम्मद अलवी  

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कोई आशिक किसी महबूबा से

फैज़ अहमद फैज़ की एक नज़्म   

याद की राहगुज़र जिसपे इसी सूरत से 
मुद्दतें बीत गयी हैं तुम्हें चलते-चलते
ख़त्म हो जायें जो दो चार कदम और चलो 
मोड़ पड़ता है जहां दश्ते-फरामोशी का 
जिसके आगे न कोई तुम हो न कोई मैं हूं.

सांस थामे हैं निगाहें कि न जाने किस दम 
तुम पलट आओ, गुजर जाओ या मुड़कर देखो
गरचे वाफिक हैं निगाहें कि ये सब धोखा है.
गर कहीं तुमसे हमगोश हुईं फिर से नज़र 
फूट निकलेगी वहां और कोई रहगुज़र 
फिर उसी तरह जहां होगा मुकाबिल पैहम 
साया-ये-जुल्फ का और जुंबिशे-बाजू का सफ़र 

दूसरी बात भी झूठी है कि दिल जानता है 
यां कोई मोड़, कोई दश्त कोई घात नहीं 
जिसके परदे में मेरा माहे-रवां डूब सके
तुमसे चलती रहे ये राह युहीं अच्छा है
तुमने मुड़कर भी न देखा तो कोई बात नहीं.

----फैज़ अहमद फैज़  

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