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दोनों जहान तेरी मुहब्बत में हार के

दोनों जहान तेरी मुहब्बत में हार के.
वो जा रहा है कोई शबे-ग़म गुजार के.

वीरान है मैकदा ख़ुमो-सागर उदास हैं
तुम क्या गए की रूठ गए दिन बहार के.

इक फुर्सते-गुनाह मिली वो भी चार दिन
देखे हैं हमने हौसले परवरदिगार के.

दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया
तुझसे भी दिलफरेब थे ग़म रोजगार के.

भूले से मुस्कुरा तो दिए थे वो 'फैज़' आज
मत पूछ वलवले दिले-नाकर्दाकर के.

---फैज़ अहमद फैज़

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जुनूने-शौक़ अब भी कम नहीं है

जुनूने-शौक़ अब भी कम नहीं है.
मगर वो आज भी बरहम नहीं है.

बहुत मुश्किल है दुनिया का सवंरना 
तेरी जुल्फों का पेंचो-ख़म नहीं है.

बहुत कुछ और भी है इस जहां में 
ये दुनिया महज ग़म ही ग़म  नहीं है.

तकाजे क्यूं करूं पैहम न साक़ी
किसे यां फिकरे-बेशो-कम नहीं है.

मेरी बरबादियों का हमनशीनो
तुम्हें क्या खुद मुझे भी ग़म नहीं है.

अभी बज्मे-तरब से क्या उठूं मैं 
अभी तो आँख भी पुरनम नहीं है.

'मजाज़' एक बादाकश तो है यकीनन
जो हम सुनते थे वो आलम नहीं है.

------मजाज़ लखनवी 

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